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GDP की मजबूत रफ्तार के बावजूद क्यों गिर रहा शेयर बाजार? पांचवें हफ्ते भी जारी गिरावट, निफ्टी 23,700 के नीचे

सेंसेक्स-निफ्टी गिरने के क्या है कारण

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Naveen Kumar
Editor & Correspondent at Global Awaaz
06:23 am| 8 September 2026| 5 min read|
GDP की मजबूत रफ्तार के बावजूद क्यों गिर रहा शेयर बाजार? पांचवें हफ्ते भी जारी गिरावट, निफ्टी 23,700 के नीचे

नई दिल्ली। भारत की अर्थव्यवस्था भले ही मजबूत रफ्तार से बढ़ रही हो, लेकिन शेयर बाजार में फिलहाल इसका असर दिखाई नहीं दे रहा है। अप्रैल-जून 2026 तिमाही में भारत की GDP वृद्धि 7.8% रही, जो बाजार के अनुमान से बेहतर है। इसके बावजूद घरेलू शेयर बाजार लगातार दबाव में है और मंगलवार, 8 सितंबर को भी सेंसेक्स और निफ्टी में गिरावट जारी रही।

मंगलवार के कारोबार में शुरुआती समय में Sensex करीब 400 अंक तक गिरकर 75,700 के आसपास पहुंच गया, जबकि Nifty 50 करीब 23,700 के नीचे कारोबार करता दिखाई दिया। इससे पहले सोमवार को भी दोनों प्रमुख सूचकांक लगभग 0.5% की गिरावट के साथ बंद हुए थे। सोमवार की गिरावट के साथ निफ्टी और सेंसेक्स छह हफ्ते के निचले स्तर पर पहुंच गए थे।

GDP मजबूत, फिर बाजार क्यों कमजोर?

बाजार की चाल केवल GDP के आंकड़ों से तय नहीं होती। इस समय निवेशकों का ध्यान आर्थिक विकास से ज्यादा कच्चे तेल की कीमतों, वैश्विक तनाव, अमेरिकी ब्याज दरों, रुपये और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर है।

1. महंगा कच्चा तेल सबसे बड़ी चिंता

मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। मंगलवार को Brent crude करीब 98 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85% आयात करता है। इसलिए तेल महंगा होने से देश के आयात बिल, कंपनियों की लागत और महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।

यही वजह है कि GDP के मजबूत आंकड़ों के बावजूद बाजार में निवेशकों की चिंता कम नहीं हुई है।

2. अमेरिका में ब्याज दर बढ़ने की आशंका

अमेरिका के मजबूत रोजगार आंकड़ों ने यह चिंता बढ़ाई है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व सितंबर में ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख अपना सकता है। अमेरिकी ब्याज दरें ऊंची रहने पर विदेशी निवेशकों के लिए डॉलर आधारित परिसंपत्तियां ज्यादा आकर्षक हो सकती हैं, जिससे उभरते बाजारों से पूंजी निकलने का दबाव बढ़ सकता है।

3. विदेशी निवेशकों की बिकवाली

सितंबर के पहले सप्ताह में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय शेयरों में फिर से शुद्ध बिकवाल बने और करीब ₹7,443 करोड़ की निकासी की। ऊंची तेल कीमतें, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और मजबूत डॉलर ने विदेशी निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को प्रभावित किया है।

4. रुपये पर भी दबाव

तेल की कीमतों में तेजी का असर रुपये पर भी पड़ रहा है। 8 सितंबर को रुपया करीब ₹94.68 प्रति डॉलर तक कमजोर हुआ। बाजार में माना जा रहा है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें रुपये पर दबाव बनाए रख सकती हैं।

रुपये की कमजोरी से उन कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है जो बड़ी मात्रा में आयात करती हैं, जबकि कुछ निर्यात आधारित कंपनियों को इसका फायदा मिल सकता है।

5. IPO में जा रहा निवेशकों का पैसा

भारतीय प्राथमिक बाजार में इस समय IPO गतिविधियां भी काफी तेज हैं। इस सप्ताह करीब 12 IPO बाजार में आने की उम्मीद है, जिनसे लगभग ₹7,000 करोड़ जुटाने का लक्ष्य है। ऐसे समय में निवेशकों का पैसा नए इश्यू में जाने से पहले से सूचीबद्ध शेयरों में खरीदारी का दबाव कुछ कम हो सकता है।

फिर GDP का फायदा बाजार को कब मिलेगा?

GDP की 7.8% वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। अप्रैल-जून तिमाही में निवेश, विनिर्माण और सेवाओं से आर्थिक गतिविधियों को मजबूती मिली। निजी क्षेत्र का पूंजी निवेश भी बढ़ा है, जिससे अर्थव्यवस्था के लंबे समय के विकास की तस्वीर मजबूत दिखाई देती है।

लेकिन शेयर बाजार भविष्य की कमाई और जोखिम को पहले से कीमतों में शामिल करता है। इसलिए अगर निवेशकों को लगता है कि महंगा तेल, वैश्विक तनाव या ऊंची अमेरिकी ब्याज दरें आने वाले महीनों में कंपनियों के मुनाफे को प्रभावित कर सकती हैं, तो मजबूत GDP के बावजूद बाजार में गिरावट आ सकती है।

आगे बाजार के लिए क्या अहम रहेगा?

आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर मुख्य रूप से कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिका की ब्याज दरों से जुड़े संकेतों, विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री और रुपये की चाल पर रहेगी। इसके अलावा अमेरिकी महंगाई के आंकड़े भी बाजार की दिशा के लिए महत्वपूर्ण होंगे।

फिलहाल बाजार का रुख कमजोर बना हुआ है। मंगलवार को Nifty 50 करीब 23,600-23,500 के क्षेत्र को महत्वपूर्ण सपोर्ट जोन के तौर पर देख रहा है। हालांकि, बाजार की दिशा वैश्विक घटनाक्रमों के कारण तेजी से बदल सकती है।

निष्कर्ष

भारत की GDP का 7.8% बढ़ना अर्थव्यवस्था के लिए मजबूत संकेत है, लेकिन शेयर बाजार इस समय अलग-अलग जोखिमों को ज्यादा महत्व दे रहा है। महंगा कच्चा तेल, मध्य-पूर्व का तनाव, अमेरिकी ब्याज दरों की चिंता, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और रुपये पर दबाव बाजार की तेजी पर भारी पड़ रहे हैं।

इसलिए मौजूदा गिरावट को केवल भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी के तौर पर देखना सही नहीं होगा। फिलहाल यह गिरावट मुख्य रूप से वैश्विक जोखिम और निवेशकों के कमजोर सेंटीमेंट से जुड़ी हुई दिखाई दे रही है।

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