चार अंतरराष्ट्रीय गोल्ड
मेडल, फिर भी रांची में सब्जी
बेचने को मजबूर अमरदीप; परिवार ने कहा-
बेटे की उपलब्धियों पर गर्व, लेकिन मदद की उम्मीद
रांची: देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चार गोल्ड मेडल जीतने वाले झारखंड के
थ्रोबॉल खिलाड़ी अमरदीप कुमार की कहानी इन दिनों चर्चा में है। रांची के
अरगोड़ा इलाके के रहने वाले अमरदीप ने खेल के मैदान में देश का नाम रोशन किया, लेकिन आर्थिक चुनौतियों के कारण आज उन्हें परिवार की मदद के
लिए सब्जी बेचनी पड़ रही है। जरूरत पड़ने पर वह कैब भी चलाते हैं। उनकी यह स्थिति
खेल प्रतिभाओं को मिलने वाली सहायता और रोजगार के अवसरों पर सवाल खड़े कर रही है।
13 साल की उम्र
में शुरू किया थ्रोबॉल
रिपोर्टों के मुताबिक अमरदीप ने करीब 13 साल की उम्र
में रांची के जयपाल सिंह मुंडा
स्टेडियम में थ्रोबॉल का प्रशिक्षण शुरू किया। उन्हें वहां शुरुआती दौर में मुफ्त
प्रशिक्षण मिला। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद उन्होंने मेहनत जारी रखी और
धीरे-धीरे राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनाई।
इसके बाद उनका चयन भारतीय टीम के लिए हुआ और उन्होंने अंतरराष्ट्रीय
प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया।
चार अंतरराष्ट्रीय गोल्ड मेडल
अमरदीप के खाते में अब तक चार
अंतरराष्ट्रीय गोल्ड मेडल दर्ज हैं।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने—
- 2015: मलेशिया में आयोजित एशियन जूनियर थ्रोबॉल चैंपियनशिप
- 2017: काठमांडू में भारत-नेपाल थ्रोबॉल चैंपियनशिप
- 2019: बेंगलुरु में साउथ एशियन थ्रोबॉल चैंपियनशिप
- 2026: रांची में साउथ एशियन थ्रोबॉल चैंपियनशिप
में स्वर्ण पदक जीता।
इन उपलब्धियों के बावजूद अमरदीप को अब तक वह आर्थिक स्थिरता नहीं मिल सकी, जिसकी उम्मीद एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी अपने करियर के बाद करता
है।
प्रतियोगिताओं के लिए लेना
पड़ा कर्ज
अमरदीप के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए उन्हें
कई बार आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ा। रिपोर्टों में बताया गया है कि मलेशिया
की प्रतियोगिता में जाने के लिए उन्हें करीब 65 हजार रुपये का
कर्ज लेना पड़ा था।
उन्होंने अलग-अलग प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए भी आर्थिक संसाधन जुटाने
की कोशिश की।
अमरदीप का कहना है कि परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होने के कारण खेल के
साथ-साथ उन्हें आजीविका के लिए भी काम करना पड़ रहा है।
पिता भी बेचते हैं सब्जी, मां घर-घर जाकर करती हैं बिक्री
अमरदीप का परिवार लंबे समय से आर्थिक संघर्ष से गुजर रहा है। रिपोर्टों के
अनुसार उनके पिता अरगोड़ा
चौक पर सब्जी बेचते हैं, जबकि उनकी मां
भी सब्जी बेचकर परिवार की आय में सहयोग करती हैं। उनके बड़े भाई की छोटी दुकान/फास्ट
फूड का काम बताया गया है।
ऐसे परिवार से निकलकर अमरदीप का अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचना उनकी मेहनत और
खेल के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
परिवार को बेटे की
उपलब्धियों पर गर्व
परिवार के लिए अमरदीप के चार अंतरराष्ट्रीय गोल्ड मेडल गर्व की बात हैं। उनके
पिता ने बताया कि बेटे को प्रतियोगिताओं में भेजने के लिए परिवार को कई बार कर्ज
लेना पड़ा, लेकिन अमरदीप के देश के लिए
खेलने के जुनून के सामने परिवार ने उसका साथ दिया।
परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उनकी इच्छा है कि अमरदीप को सम्मानजनक
रोजगार या ऐसी सहायता मिले, जिससे वह अपने
खेल करियर को जारी रखते हुए परिवार की जिम्मेदारियां भी निभा सकें।
सरकारी नौकरी के लिए कर रहे
हैं प्रयास
अमरदीप के अनुसार वह लंबे समय से सरकारी नौकरी और आर्थिक सहायता के लिए प्रयास
कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने संबंधित अधिकारियों के सामने अपना मामला रखा, लेकिन अभी तक उन्हें स्थायी समाधान नहीं मिला। दूसरी ओर, कुछ रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि राज्य की खेल नीति
के तहत उनकी पात्रता को लेकर समस्या बताई गई।
अमरदीप का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने वाले
खिलाड़ियों को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उनका खेल ओलंपिक
में शामिल नहीं है।
सोशल मीडिया पर तस्वीरें
वायरल होने के बाद सरकार का ध्यान
अमरदीप की सब्जी बेचते हुए तस्वीरें और उनकी कहानी सोशल मीडिया पर वायरल होने
के बाद मामला चर्चा में आया। इसके बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मामले का संज्ञान लेते हुए खेल विभाग को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए।
रिपोर्टों के मुताबिक झारखंड मिल्क फेडरेशन (मेधा) की ओर से भी अमरदीप के लिए
रोजगार के अवसरों पर विचार किए जाने की बात सामने आई है।
खेल जारी रखने का संकल्प
आर्थिक परेशानियों के बावजूद अमरदीप ने खेल छोड़ने का फैसला नहीं किया है।
रिपोर्टों के अनुसार वह आगामी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की तैयारी भी कर रहे
हैं। उनकी कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी के संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि उन प्रतिभाओं की चुनौती को भी सामने लाती है जिन्हें
अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों के बावजूद करियर और आजीविका के बीच संतुलन बनाना पड़ता
है।
अमरदीप की चार स्वर्ण पदक वाली उपलब्धियां इस बात की गवाही देती हैं कि झारखंड
में प्रतिभा की कमी नहीं है। जरूरत इस बात की है कि ऐसी प्रतिभाओं को सम्मान, रोजगार और खेल जारी रखने के लिए जरूरी संस्थागत सहयोग समय पर मिल सके।

