पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में शामिल हुए विभिन्न समुदायों के लोग, विश्वविद्यालयों में भाषाओं की पढ़ाई शुरू कराने और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की उठाई मांग
रांची। झारखंड की भाषाई, सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान को बचाने की मांग को लेकर राजधानी रांची में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा मार्च निकाला जा रहा है। झारखंडी भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और विकास के उद्देश्य से आयोजित इस मार्च में बड़ी संख्या में आदिवासी समाज और विभिन्न झारखंडी समुदायों के लोग शामिल हुए हैं। मार्च में शामिल लोगों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा के माध्यम से झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन किया और अपनी मातृभाषाओं को उचित सम्मान देने की मांग उठाई।
मार्च के दौरान लोगों के हाथों में अलग-अलग मांगों से जुड़ी तख्तियां नजर आईं। इनके माध्यम से झारखंड की जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को बचाने, शिक्षा व्यवस्था में उचित स्थान देने और इनके विकास के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की जा रही है। पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे महिला-पुरुषों और युवाओं की भागीदारी ने मार्च को सांस्कृतिक स्वरूप भी दिया। इस दौरान विभिन्न समुदायों के लोगों में अपनी भाषा और संस्कृति को लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा है।
विश्वविद्यालयों में झारखंडी भाषाओं की पढ़ाई को लेकर उठे सवाल
मार्च में शामिल प्रदर्शनकारियों का कहना है कि झारखंड में कई ऐसी जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएं हैं, जिनका अपना समृद्ध इतिहास और साहित्यिक महत्व है। इसके बावजूद विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में इन भाषाओं की पढ़ाई को पर्याप्त बढ़ावा नहीं मिल रहा है। कई भाषाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाई और आगे की शैक्षणिक संभावनाओं को लेकर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
प्रदर्शनकारियों के अनुसार, यदि विश्वविद्यालयों में झारखंडी भाषाओं के अध्ययन और शोध के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं होगी, तो इन भाषाओं से जुड़ी नई पीढ़ी का जुड़ाव धीरे-धीरे कमजोर हो सकता है। उनका कहना है कि भाषा केवल बातचीत का माध्यम नहीं होती, बल्कि इसके साथ किसी समाज का इतिहास, परंपरा, लोकसाहित्य, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक विरासत भी जुड़ी होती है।
पढ़ाई के साथ रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की मांग
मार्च के माध्यम से केवल भाषाओं की पढ़ाई शुरू कराने की ही मांग नहीं की जा रही है, बल्कि प्रदर्शनकारियों ने इन भाषाओं से जुड़े युवाओं के लिए रोजगार के अवसर विकसित करने पर भी जोर दिया है। उनका कहना है कि जब तक किसी भाषा को शिक्षा, प्रशासन, साहित्य और रोजगार से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक उसका व्यापक विकास मुश्किल होगा।
लोगों की मांग है कि झारखंडी भाषाओं के जानकार युवाओं के लिए शिक्षण, अनुवाद, शोध और अन्य संबंधित क्षेत्रों में अवसर उपलब्ध कराए जाएं। इसके अलावा जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य को प्रोत्साहित करने, पुस्तकों के प्रकाशन और नई पीढ़ी तक इन भाषाओं को पहुंचाने के लिए भी पहल की जानी चाहिए।
झारखंड की पहचान से जुड़ी हैं जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएं
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि झारखंड का गठन अपनी विशिष्ट भाषा, संस्कृति, परंपरा और सामाजिक पहचान के आधार पर हुआ था। राज्य की पहचान यहां की जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं से गहराई से जुड़ी हुई है। नागपुरी, खोरठा, कुरमाली, पंचपरगनिया, संताली, मुंडारी, हो, कुड़ुख और खड़िया जैसी भाषाएं झारखंड की विविध भाषाई विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
इन भाषाओं के माध्यम से अलग-अलग समुदाय अपनी परंपराओं, लोकगीतों, कहानियों और ऐतिहासिक अनुभवों को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाते आए हैं। ऐसे में इन भाषाओं का संरक्षण केवल भाषाई विषय नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का भी सवाल है।
सरकार से ठोस पहल करने की मांग
मार्च में शामिल लोगों ने सरकार और संबंधित शैक्षणिक संस्थानों से झारखंडी भाषाओं के विकास के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है। उनकी प्रमुख मांगों में विश्वविद्यालयों में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई को मजबूत करना, शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना, भाषा एवं साहित्य पर शोध को बढ़ावा देना और इन भाषाओं से जुड़े युवाओं के लिए रोजगार के अवसर तैयार करना शामिल है।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि झारखंड की भाषाओं को उचित शैक्षणिक और संस्थागत समर्थन नहीं मिला, तो आने वाले समय में नई पीढ़ी अपनी मातृभाषाओं से दूर हो सकती है। इसलिए भाषाओं को केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित रखने के बजाय शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन में भी उनका उपयोग बढ़ाना जरूरी है।
जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा मार्च के जरिए लोगों ने अपनी भाषाई पहचान और सांस्कृतिक अधिकारों को लेकर एकजुटता दिखाई है। मार्च का मुख्य संदेश है कि झारखंड की पहचान को बनाए रखने के लिए यहां की भाषाओं का संरक्षण और विकास जरूरी है।

