रांची: राजधानी रांची से एक संवेदनशील मामला सामने आया है। राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में लंबे समय से रखे गए 43 लावारिस शवों का सामूहिक अंतिम संस्कार किया गया। इन शवों की पहचान नहीं हो सकी थी और इनके परिजनों का भी पता नहीं चल पाया था।
बताया गया कि सभी शव रिम्स के शवगृह में रखे गए थे। नियमानुसार निर्धारित प्रक्रिया पूरी करने के बाद इनका अंतिम संस्कार कराया गया। जुमार नदी के किनारे इन शवों को अंतिम विदाई दी गई।
लंबे समय से शवगृह में रखे थे शव
रिम्स में इलाज के दौरान मौत या अन्य परिस्थितियों में कई ऐसे शव पहुंचते हैं, जिनकी पहचान नहीं हो पाती। कुछ मामलों में पुलिस की ओर से पहचान की कोशिश की जाती है और परिजनों की तलाश भी की जाती है। लेकिन काफी प्रयास के बाद भी जब पहचान या परिजनों का पता नहीं चलता, तो प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत ऐसे शवों का अंतिम संस्कार कराया जाता है।
इसी प्रक्रिया के तहत रिम्स में रखे 43 अज्ञात और लावारिस शवों का अंतिम संस्कार किया गया।
पहचान और परिजनों की तलाश के बाद हुई कार्रवाई
शवों का अंतिम संस्कार करने से पहले संबंधित स्तर पर उनकी पहचान और उनके परिजनों का पता लगाने की प्रक्रिया की जाती है। जब किसी शव की पहचान नहीं हो पाती और उसे लंबे समय तक सुरक्षित रखना संभव नहीं होता, तब नियमों के अनुसार अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
इस दौरान शवों से संबंधित आवश्यक रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखे जाते हैं, ताकि भविष्य में किसी व्यक्ति द्वारा पहचान या जानकारी के लिए संपर्क किए जाने पर रिकॉर्ड की जांच की जा सके।
जुमार नदी किनारे दी गई अंतिम विदाई
43 शवों के सामूहिक अंतिम संस्कार के दौरान जुमार नदी का किनारा अंतिम विदाई का स्थान बना। यह दृश्य बेहद संवेदनशील रहा। जिन लोगों के शवों की पहचान नहीं हो सकी, उन्हें भी अंतिम संस्कार के जरिए सम्मानपूर्वक विदाई दी गई।
रिम्स राज्य का प्रमुख सरकारी अस्पताल है, जहां झारखंड के अलावा आसपास के राज्यों से भी बड़ी संख्या में मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। रिम्स की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार संस्थान में शवगृह समेत मरीजों और मृत्यु से संबंधित विभिन्न सेवाओं की व्यवस्था उपलब्ध है।
संवेदनशील मामला, पहचान का इंतजार
लावारिस शवों का अंतिम संस्कार केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि इससे जुड़ा मानवीय पहलू भी बेहद महत्वपूर्ण है। हर शव के पीछे एक परिवार और उसकी अपनी कहानी हो सकती है। ऐसे में पहचान नहीं हो पाने की स्थिति में भी शवों का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार करना जरूरी है।
43 शवों के अंतिम संस्कार के बाद अब भी इनसे जुड़े रिकॉर्ड महत्वपूर्ण रहेंगे। यदि भविष्य में किसी शव की पहचान या परिजनों के संबंध में कोई जानकारी सामने आती है, तो संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर आगे की प्रक्रिया की जा सकती है।
यह घटना एक बार फिर यह सवाल भी सामने लाती है कि अस्पतालों में आने वाले अज्ञात मरीजों और मृतकों की पहचान सुनिश्चित करने तथा उनके परिजनों तक सूचना पहुंचाने की व्यवस्था को और मजबूत कैसे बनाया जाए।

