धनबाद/हावड़ा: कभी भारतीय रेलवे की नई तकनीक और आधुनिक यात्री सुविधा की मिसाल मानी जाने वाली धनबाद-हावड़ा एसी डबल डेकर ट्रेन अब इतिहास का हिस्सा बनने जा रही है। वर्ष 2011 में बड़े उत्साह के साथ शुरू की गई देश की पहली एसी डबल डेकर ट्रेन को यात्रियों का अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका। परिचालन बंद होने के बाद इसके कोच लंबे समय से हावड़ा यार्ड में खड़े हैं। अब रेलवे बोर्ड की मंजूरी के बाद पूर्व रेलवे ने ट्रेन को स्थायी रूप से बंद करने का फैसला किया है और इसके कोचों को स्क्रैप किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ने की संभावना है।
2011 में हुई थी शानदार शुरुआत
धनबाद और हावड़ा के बीच एसी डबल डेकर ट्रेन का परिचालन 1 अक्टूबर 2011 को शुरू हुआ था। तत्कालीन रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने हावड़ा स्टेशन से ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। इसे भारतीय रेलवे की एक महत्वपूर्ण पहल माना गया था, क्योंकि एक ही कोच में दो स्तर पर यात्रियों को बैठाने की व्यवस्था के जरिए अधिक यात्रियों को सुविधा देने की कोशिश की गई थी।
रेलवे के सामने डबल डेकर कोच तैयार करना भी एक तकनीकी चुनौती थी। रेलवे की डिजाइन टीम ने मौजूदा पुलों, फुटओवर ब्रिज और विद्युत उपकरणों की ऊंचाई को ध्यान में रखते हुए कोच का डिजाइन तैयार किया था। पहला एसी डबल डेकर प्रोटोटाइप रेल कोच फैक्ट्री, कपूरथला में तैयार किया गया था।
257 किलोमीटर का सफर करती थी ट्रेन
धनबाद-हावड़ा डबल डेकर एक्सप्रेस करीब 257 किलोमीटर की दूरी तय करती थी। इसका संचालन एसी चेयर कार के रूप में किया जाता था। ट्रेन हावड़ा से धनबाद और धनबाद से हावड़ा के बीच चलती थी और रास्ते में बर्द्धमान, दुर्गापुर, आसनसोल, बराकर और कुमारधुबी जैसे स्टेशनों पर ठहराव था।
शुरुआत में इस ट्रेन को लेकर यात्रियों में काफी उत्साह था। इसका अलग डिजाइन और दो मंजिला कोच यात्रियों के लिए आकर्षण का केंद्र थे। लेकिन शुरुआती उत्साह लंबे समय तक यात्री मांग में नहीं बदल सका।
महंगा किराया और समय बना बड़ी वजह
रेलवे के मुताबिक, ट्रेन को अपेक्षित यात्री नहीं मिल सके। रिपोर्टों में इसकी प्रमुख वजह अधिक किराया और यात्रियों के लिए सुविधाजनक नहीं मानी जाने वाली समय-सारिणी बताई गई। कम यात्री मिलने के कारण ट्रेन लगातार घाटे में चल रही थी। एक रिपोर्ट के अनुसार, रेलवे को इससे करीब 11 लाख रुपये प्रतिदिन तक का नुकसान हो रहा था।
ट्रेन का शुरुआती समय भी कामकाजी यात्रियों की जरूरतों के मुताबिक पूरी तरह अनुकूल नहीं था। हावड़ा से सुबह 8:35 बजे रवाना होकर ट्रेन दोपहर 12:50 बजे धनबाद पहुंचती थी, जबकि वापसी में धनबाद से शाम 6:30 बजे चलकर रात करीब 10:40 बजे हावड़ा पहुंचती थी।
कई बार दोबारा चलाने की कोशिश
डबल डेकर ट्रेन को पूरी तरह खत्म करने से पहले रेलवे ने इसे दोबारा चलाने के कई विकल्पों पर विचार किया। वर्ष 2016 में इसे छठ पूजा के दौरान स्पेशल ट्रेन के रूप में भी चलाया गया था। उस समय ट्रेन की दोबारा स्थायी सेवा शुरू होने की उम्मीद जगी थी, लेकिन यह उम्मीद पूरी नहीं हो सकी।
इसके बाद धनबाद रेल मंडल की ओर से वर्ष 2018 में इसे हावड़ा से पारसनाथ तक चलाने का प्रस्ताव भी भेजा गया था। इस प्रस्ताव के तहत कुछ स्टेशनों के प्लेटफॉर्म और अन्य संरचनाओं में बदलाव की तैयारी भी की गई थी, लेकिन योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
2026 में फिर जगी थी उम्मीद
हाल ही में आयोजित PCME Conference 2026 के दौरान पूर्व रेलवे ने लंबे समय से हावड़ा यार्ड में खड़ी डबल डेकर ट्रेन का मुद्दा रेलवे बोर्ड के सामने उठाया था। इससे एक बार फिर ट्रेन के पुनः परिचालन की उम्मीद जगी थी। रेलवे बोर्ड से ट्रेन के भविष्य को लेकर समाधान मांगा गया था।
हालांकि अब रेलवे बोर्ड की मंजूरी के बाद तस्वीर बदल गई है। ट्रेन को स्थायी रूप से बंद करने का निर्णय लिया गया है। ऐसे में लंबे समय से यार्ड में खड़े इसके कोचों के स्क्रैप किए जाने का रास्ता साफ होता दिख रहा है।
अब यादों में रह जाएगी डबल डेकर ट्रेन
धनबाद-हावड़ा एसी डबल डेकर ट्रेन अपने समय में रेलवे की आधुनिक सोच और नई तकनीक का प्रतीक थी। यात्रियों को एक अलग तरह की रेल यात्रा का अनुभव देने वाली यह ट्रेन भले ही व्यावसायिक रूप से सफल नहीं हो सकी, लेकिन भारतीय रेलवे के इतिहास में इसका नाम महत्वपूर्ण प्रयोग के तौर पर दर्ज रहेगा।
अब हावड़ा यार्ड में लंबे समय से खड़े इसके कोचों के स्क्रैप होने के बाद इस ट्रेन के दोबारा पटरी पर लौटने की संभावना लगभग खत्म हो जाएगी। कभी यात्रियों के आकर्षण का केंद्र रही यह डबल डेकर ट्रेन जल्द ही भारतीय रेलवे की पुरानी यादों का हिस्सा बन सकती है।

