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ब्रिक्स में आएंगे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, गलवान के बाद पहली बार भारत दौरा, 12-13 सितंबर को दिल्ली में जुटेंगे दुनिया के बड़े नेता

18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में

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06:21 am| 11 September 2026| 5 min read|
ब्रिक्स में आएंगे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, गलवान के बाद पहली बार भारत दौरा, 12-13 सितंबर को दिल्ली में जुटेंगे दुनिया के बड़े नेता

नई दिल्ली। भारत की मेजबानी में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित होने जा रहा है। इस सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजर है, क्योंकि इसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत ब्रिक्स के कई सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख शामिल होंगे। चीन ने आधिकारिक रूप से पुष्टि की है कि शी जिनपिंग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर 12 से 13 सितंबर तक भारत आएंगे।

शी जिनपिंग का यह दौरा भारत-चीन संबंधों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद यह शी जिनपिंग की पहली भारत यात्रा होगी। इससे पहले वह अक्टूबर 2019 में महाबलीपुरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अनौपचारिक शिखर वार्ता के लिए भारत आए थे।

12 और 13 सितंबर को होगा ब्रिक्स सम्मेलन

भारत इस साल ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और इसी के तहत 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन नई दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है। सम्मेलन का आयोजन 12 और 13 सितंबर 2026 को भारत मंडपम, नई दिल्ली में होगा। भारत की 2026 ब्रिक्स अध्यक्षता का थीम है:

“Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability”

यानी लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के लिए निर्माण। भारत ने इस अध्यक्षता के दौरान ब्रिक्स सहयोग को तीन प्रमुख स्तंभों के तहत आगे बढ़ाया है, जिनमें राजनीतिक एवं सुरक्षा सहयोग, आर्थिक एवं वित्तीय सहयोग तथा सांस्कृतिक और लोगों के बीच संपर्क शामिल हैं।

भारत के मुताबिक 2026 में उसकी अध्यक्षता के दौरान 25 से अधिक शहरों में 350 से ज्यादा बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं।

12 सितंबर का कार्यक्रम क्या रहेगा?

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का पहला दिन मुख्य रूप से सदस्य देशों के नेताओं की बैठकों और बंद कमरे में होने वाली बातचीत के लिए महत्वपूर्ण होगा।

दोपहर 2 बजे: ब्रिक्स सदस्य देशों के नेताओं का आगमन।

दोपहर 2:35 बजे: बंद कमरे में पहला प्रमुख सत्र होगा। इसका विषय “Inclusive Global Governance and Strengthening Multilateralism”, यानी समावेशी वैश्विक शासन और बहुपक्षवाद को मजबूत करना होगा। इस सत्र में वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने पर चर्चा महत्वपूर्ण रहने की उम्मीद है।

शाम 4:25 बजे: नेता Bharat Innovates Exhibition का दौरा करेंगे। इसमें भारत की नवाचार और तकनीकी क्षमता को प्रदर्शित किया जाएगा।

शाम 5:05 बजे: ब्रिक्स नेताओं का आधिकारिक फैमिली फोटो होगा।

शाम 5:10 बजे: नेताओं की ओर से संयुक्त पौधरोपण कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।

शाम 7:30 बजे: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिक्स नेताओं के सम्मान में गाला डिनर आयोजित करेंगे।

13 सितंबर को क्या होगा?

सम्मेलन के दूसरे दिन ब्रिक्स के सदस्य देशों के अलावा पार्टनर देशों और आउटरीच आमंत्रित देशों के नेता भी कार्यक्रम में शामिल होंगे।

सुबह 9:55 बजे: पार्टनर देशों और आउटरीच आमंत्रित देशों के नेताओं का आगमन होगा।

सुबह 10:35 बजे: आधिकारिक समूह फोटो का कार्यक्रम होगा।

सुबह 10:50 बजे: मुख्य ओपन सेशन शुरू होगा। इसका विषय होगा:

“Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability: Shaping the Future for Inclusive Global Growth”

इस सत्र में वैश्विक अर्थव्यवस्था, विकास, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा, तकनीकी सहयोग, आपूर्ति श्रृंखला तथा वैश्विक दक्षिण के हितों जैसे मुद्दों पर व्यापक चर्चा होने की उम्मीद है। सम्मेलन के अंत में नई दिल्ली घोषणा-पत्र (New Delhi Declaration) जारी किया जाना प्रस्तावित है।

मोदी-शी जिनपिंग मुलाकात पर सबसे ज्यादा नजर

ब्रिक्स सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संभावित द्विपक्षीय बैठक इस पूरे कार्यक्रम का सबसे अहम राजनीतिक घटनाक्रम बन सकती है।

दोनों नेताओं की बातचीत में भारत-चीन सीमा पर शांति एवं स्थिरता, सीमा प्रबंधन, दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश, बाजार पहुंच, वीजा व्यवस्था तथा आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने जैसे मुद्दे उठ सकते हैं। दोनों देशों के बीच हाल के समय में सीमा तनाव कम करने और सैन्य स्तर पर संवाद बढ़ाने की दिशा में कुछ प्रगति हुई है।

एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव Strategic Economic Dialogue शुरू करने का भी है। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलन, बाजार पहुंच, निवेश और कारोबारी बाधाओं जैसे मुद्दों पर संस्थागत बातचीत का रास्ता तैयार करना हो सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि एक बैठक से सभी पुराने विवादों का समाधान संभव नहीं है और दोनों देशों के संबंधों में अभी भी विश्वास की कमी बनी हुई है।

गलवान के बाद शी का पहला भारत दौरा क्यों अहम?

जून 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक टकराव के बाद दोनों देशों के संबंधों में लंबे समय तक तनाव रहा। सीमा पर सैनिकों की तैनाती बढ़ी और इसका असर व्यापार तथा दोनों देशों के व्यापक संबंधों पर भी पड़ा।

अब कई वर्षों बाद शी जिनपिंग का भारत आना इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि यह दोनों देशों के बीच संबंधों को स्थिर करने की कोशिशों को राजनीतिक स्तर पर नई गति दे सकता है। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच सीमा से जुड़े मुद्दों पर बातचीत और सैन्य तनाव कम करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं।

ब्रिक्स में कौन-कौन से देश हैं?

भारत की अध्यक्षता वाले मौजूदा ब्रिक्स समूह का विस्तार पहले की तुलना में काफी बड़ा हो चुका है। भारत सरकार के अनुसार इसमें 11 सदस्य देश हैं:

भारत, चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब।

भारत सरकार के अनुसार ये देश मिलकर दुनिया की करीब 49.5 प्रतिशत आबादी, 40 प्रतिशत वैश्विक GDP और 26 प्रतिशत वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इस बार के ब्रिक्स में कौन से मुद्दे सबसे महत्वपूर्ण?

1. वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार

भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और दूसरी वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने की बात करता रहा है। ब्रिक्स के मंच पर बहुपक्षीय व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने का मुद्दा महत्वपूर्ण रहेगा।

2. पश्चिम एशिया और ईरान संकट

ब्रिक्स सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब पश्चिम एशिया में गंभीर तनाव जारी है। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात दोनों ब्रिक्स के सदस्य हैं, लेकिन मौजूदा संघर्ष ने संगठन के भीतर मतभेद भी पैदा किए हैं।

ब्रिक्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऐसी भाषा पर सहमति बनाना होगी, जिस पर ईरान और यूएई दोनों सहमत हो सकें। मई में ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में भी ईरान और यूएई के मतभेदों के कारण संयुक्त बयान जारी नहीं हो पाया था।

3. ऊर्जा सुरक्षा

ईरान संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रमों ने ऊर्जा आपूर्ति और तेल व्यापार को वैश्विक चिंता बना दिया है। इसलिए ऊर्जा सुरक्षा, स्थिर आपूर्ति और व्यापार मार्गों की सुरक्षा ब्रिक्स नेताओं की बातचीत में महत्वपूर्ण मुद्दा हो सकती है।

4. व्यापार और डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश

ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वित्तीय सहयोग और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में सुधार पर भी चर्चा महत्वपूर्ण होगी। हालांकि अलग-अलग देशों की वित्तीय व्यवस्थाओं और आर्थिक हितों में अंतर के कारण इस दिशा में व्यावहारिक सहमति हासिल करना चुनौतीपूर्ण है।

5. खाद्य सुरक्षा और सप्लाई चेन

वैश्विक संघर्षों और व्यापारिक तनावों के बीच खाद्य तथा आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति को मजबूत बनाना भी एजेंडे में प्रमुख रहेगा। भारत विशेष रूप से ऐसी सप्लाई चेन बनाने पर जोर दे रहा है जो संकट के समय भी काम करती रहें।

6. तकनीक, स्टार्टअप और इनोवेशन

ब्रिक्स देशों के बीच तकनीकी सहयोग को बढ़ाने के लिए BRICS Incubator Network और BRICS Startup Innovation Fund जैसे प्रस्तावों पर काम किया जा रहा है। इसके अलावा लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन सहयोग के लिए एक व्यापक फ्रेमवर्क पर भी चर्चा हो रही है।

रूस के राष्ट्रपति पुतिन की मौजूदगी भी अहम

ब्रिक्स सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी भी महत्वपूर्ण होगी। भारत और रूस के बीच ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग लंबे समय से मजबूत रहा है। प्रधानमंत्री मोदी और पुतिन के बीच द्विपक्षीय बातचीत में व्यापार, निवेश, ऊर्जा, रक्षा, तकनीक और यूक्रेन संघर्ष जैसे मुद्दों पर चर्चा की संभावना है।

इस तरह दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स सम्मेलन सिर्फ आर्थिक सहयोग का मंच नहीं होगा। भारत-चीन संबंधों में सुधार, रूस के साथ रणनीतिक संबंध, पश्चिम एशिया संकट, ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार व्यवस्था और विकासशील देशों की बढ़ती भूमिका जैसे कई बड़े मुद्दे इस सम्मेलन को बेहद महत्वपूर्ण बना रहे हैं।

क्यों खास है 2026 का ब्रिक्स सम्मेलन?

2026 का सम्मेलन भारत के लिए इसलिए भी विशेष है क्योंकि यह उसकी चौथी ब्रिक्स अध्यक्षता है। भारत इससे पहले 2012, 2016 और 2021 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर चुका है। साथ ही 2026 में ब्रिक्स की स्थापना के 20 वर्ष पूरे हो रहे हैं।

दिल्ली में होने वाली इस बैठक का सबसे बड़ा संदेश यह होगा कि तेजी से बदलती वैश्विक व्यवस्था में ब्रिक्स किस तरह अपनी भूमिका तय करता है। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह अलग-अलग राजनीतिक हितों वाले सदस्य देशों को साथ रखते हुए आर्थिक सहयोग, वैश्विक शासन सुधार और वैश्विक दक्षिण की आवाज को एक साझा मंच पर मजबूती से सामने रख सके।

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